27.2.24

K-016 बन्द होठों में

बंद होठों में भी मंद-मंद मुस्कान है दीखे,
खुले होठों के बीच श्वेत मोती से हैं दीखे।
नयनों की चमक कशिश अविस्मरणीय,
जो देखे, उसे जहाँ में कुछ और न दीखे।

ईर्ष्या होती है तुम्हारी घनेरी ज़ुल्फ़ों से,

सरकते सरकते कहाँ तक आ पहुंचती हैं।

हवा के झोंके नर्म गालों को जब सहलाएं,

बंधन मुक्त होके ये ज़ुल्फ़ सर्वत्र विचरती हैं।


क्यों छुपाए फिरती हो रूप की दौलत,

गर्म वस्त्रों से,इतने सारे भारी भरकम से।

तुम तो ख़ुद ही हो ऊष्मा,ऊर्जा, बला की,

क्यों डरती रहती भला सर्दी के मौसम से।


पहन लेतीं जब तुम परिधान नीला सा,

तो जैसे हो जाता है आकाश नीला सा,

धारण कर लो जब तुम वस्त्र पीला सा,

बेचारा बसंत हो जाता कुछ शर्मिला सा।


कपोल लाल-लाल, नाजुक अधर लाल,

माथे पर बिंदी लाल बदन पे शाल लाल, 

हल्की हल्की लालिमा मुख मंडल पर,

जैसे शर्म के मारे बेचारे गाल लाल-लाल।

(-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-016)







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