20.4.23

S-260 मेरी कलम को

मेरी कलम को जज़्बात की ख़ुराक चाहिए,
तहरीर के वास्ते अरमानों की ख़ाक चाहिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-260

14.4.23

S-259 नशा मुहब्बत का

नशा मुहब्बत का मुझे कुछ ज़्यादा हो गया,
मालूम ही नहीं चला वो कब बेवफ़ा हो गया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-259

11.4.23

M-059 कभी ख़ुशियों उदासियों की

कभी ख़ुशियों में उदासियों की झलक दिखाई देती है,
डबडबाई आँखों में हल्की मुस्कराहट दिखाई देती है,
अजीब नाकाबिले-बयां कैफ़ियत हो जाती है दिल की, 
दिल में कभी रौशनी तो कभी तारीकी दिखाई देती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-059

M-058 दर्द,दर्द होता है

दर्द, दर्द होता है सिर्फ शुरू-शुरू में,
फिर वो दर्द ही हमदर्द बन जाता है।
वही अकेला साथ देता है तन्हाई में,
बाकी ज़माना तो बेदर्द बन जाता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-058

G-010 बस तेरी मोहब्बत ही

तू है तो नहीं छोड़ता मैं इस दुनिया को,
वरना तो भला इस दुनियाँ में रक्खा क्या है।

बस तेरी मुहब्बत ही एक हकीकत है यहाँ,
वरना तो मसनुई दुनियां में रक्खा क्या है।

तेरी मेरी मुहब्बत में ही है कुछ ख़ास बात,
वरना तो इश्क-मुहब्बत में रक्खा क्या है।

तू ही है मेरी असली ख़ुशी इस दुनियां में,
वरना तो दीगर ख़ुशियों में रक्खा क्या है।

तू बना है गर हमसफ़र तो सब हासिल है,
वरना तो पाने को मंज़िल में रक्खा क्या है।

तेरे ही वास्ते किया है मैंने घर को रौशन,
वरना तो वीरानों को सजाने में रक्खा क्या है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"G-010

S-258 आने न दो आंसू

आने न दो आंसू, ऐसे दिखो जैसे ग़मज़दा नहीं हो।
हंसो तो इतना हंसो, कि लगे तुम शादीशुदा नहीं हो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-258

S-257 ग़मों का अजायबघर

ग़मों का अजायब-घर हूँ,दिल मे दर्द हैं किस्म-किस्म के,
किसी कोने में दर्दे-नफ़रत है, तो किसी में दर्दे-मुहब्बत भी।

 -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-257

Q-109 नज़दीक आता जा

नज़दीक आता जा रहा हूँ हकीकत के,
ख्वाबों में और जीने को मन नहीं करता।
आ जाना चाहता हूँ, अब साहिल पर मैं,
गहराई में और जाने को मन नहीं करता। 
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-109

S-256 तमाम उम्र की

तमाम उम्र की तलाश थी तू, तुझको कैसे भुलाऊँ मैं,
नफ़रतें भूल भी जाऊं तेरी, मुहब्बतों को कैसे भुलाऊँ मैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-256

10.4.23

G-009 ना तो शेर होते

ना तो शेर होते, और ना कलाम होते।
जहां में अगर सब संगदिल इंसान होते।

जज़्बात दिलों में उठा ही नहीं करते,
दर्द-ए-दिल भी, न कभी बयान होते।

तारीफ़-ए-हुस्न में, देने को मिसालें,
न ज़मीन होती, न ये आसमान होते।

बेवफ़ाई, बेरुखी से निजात मिल जाती,
इश्क़ मुहब्बत के न इतने इम्तिहान होते।

क्यूं होते शिकवे-गिले या शिकायतें इतनी,
अगर सभी अजनबी, सभी अंजान होते।

पत्थर ही तमाम चोट सह लिया करते, 
खामखाँ मासूम दिल न लहूलुहान होते।

बुतों की बस्ती में होता कत्ले-आम,"अजनबी",
वहां भी अगर बस गए कुछ इंसान होते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-009

S-255 अब न रही कोई

अब न रही कोई शिकायत बाकी, न कोई शिकवा ही रहा,
सब ख़ुद-बख़ुद दूर हो गए, जबसे तूने मुझे अजनबी कहा।
 
 -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-255

S-254 ग़म तो बहुत है

ग़म तो है बहुत मुझको, वो मुझसे जुदा हो गया ,
पर तसल्ली भी है, मै रहा इंसाँ, वो ख़ुदा हो गया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-254

S-253 मुहब्बतों से नज़र

मुहब्बतों से नज़र मोड़ी नहीं जाती।
बेवफ़ाई के डर से वफ़ा छोड़ी नहीं जाती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-253

S-252 बेवफ़ाओं के दिल

बेदर्द, ज़बेवफ़ाओं के दिल कभी तड़पा नहीं करते।
पत्थर मोम नहीं होते, वो कभी पिंघला नहीं करते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-252

Q-108 कभी ख़ुशियों

कभी ख़ुशियों में उदासियों की झलक दिखाई देती है।
डबडबाई आँखों में हल्की मुस्कराहट दिखाई देती है।
अजीब सी नाकाबिले-बयां कैफ़ियत हो जाती है दिल की, 
दिल में कभी रौशनी तो कभी तारीकी दिखाई देती है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-108

8.4.23

Q-107 मैं तेरी निगाहों में

मैं तेरी निगाहों में एक सवाल तो हूँ, 
ज़हन का फ़िज़ूल सा ख़्याल तो हूँ,
तेरे दिल की गहराइयों में मैं न सही, 
हर वक्त मैं तेरे जी का जंजाल तो हूँ.

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-107

7.4.23

P-204 कभी कभी विवेकहीन इंसाँन

कभी-कभी विवेकहीन इंसाँन बहुत बहुत पछताता है,
पछतावे के बीज उसने कब बो दिए वो समझ नहीं पाता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-204

S-251 ये सही है कि

ये सही बात है कि जज़्बात मर जाते हैं,
जब अपने ही चोट दिल पे कर जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-251

4.4.23

S-250 शौके-दीदार में

शौके-दीदार में अपना शौके-इंतज़ार बढ़ता ही गया,
दिन गया, रात गई, जुनूँ लगातार बढ़ता ही गया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-250

Q-106 बेहद खल रही है

बेहद खल रही है जुदाई उसकी,
मुझपे ये कैसी घड़ी आन पड़ी है। 
लौटा भी नहीं सकता मैं उसको,
वो निशानी जो मेरे पास पड़ी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-106

3.4.23

S-249 जाने कैसी है ये

जाने कैसी है कशिश,चाह कर भी मैं दूर हो नहीं सकता।
चला आता हूँ फिर वहीं, मुझसा कोई मजबूर हो नहीं सकता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-249

2.4.23

Q-105 काश मुखोटा

काश मुखोटा शराफ़त का उसने पहना न होता,
काश कि उस एक शाम मैं यूंही पिंघला न होता,
थोड़ा दुनियादार, तजुर्बेकार क्यों न हो सका मैं,
बुद्धि से काम लेता तो, आज दर्द इतना न होता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-105

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...