11.4.23

S-256 तमाम उम्र की

तमाम उम्र की तलाश थी तू, तुझको कैसे भुलाऊँ मैं,
नफ़रतें भूल भी जाऊं तेरी, मुहब्बतों को कैसे भुलाऊँ मैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-256

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...