ना तो शेर होते, और ना कलाम होते।
जहां में अगर सब संगदिल इंसान होते।
जहां में अगर सब संगदिल इंसान होते।
जज़्बात दिलों में उठा ही नहीं करते,
दर्द-ए-दिल भी, न कभी बयान होते।
तारीफ़-ए-हुस्न में, देने को मिसालें,
न ज़मीन होती, न ये आसमान होते।
बेवफ़ाई, बेरुखी से निजात मिल जाती,
इश्क़ मुहब्बत के न इतने इम्तिहान होते।
क्यूं होते शिकवे-गिले या शिकायतें इतनी,
अगर सभी अजनबी, सभी अंजान होते।
पत्थर ही तमाम चोट सह लिया करते,
खामखाँ मासूम दिल न लहूलुहान होते।
बुतों की बस्ती में होता कत्ले-आम,"अजनबी",
वहां भी अगर बस गए कुछ इंसान होते।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-009
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