अब न रही कोई शिकायत बाकी, न कोई शिकवा ही रहा,
सब ख़ुद-बख़ुद दूर हो गए, जबसे तूने मुझे अजनबी कहा।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-255
सब ख़ुद-बख़ुद दूर हो गए, जबसे तूने मुझे अजनबी कहा।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-255
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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