2.4.23

Q-105 काश मुखोटा

काश मुखोटा शराफ़त का उसने पहना न होता,
काश कि उस एक शाम मैं यूंही पिंघला न होता,
थोड़ा दुनियादार, तजुर्बेकार क्यों न हो सका मैं,
बुद्धि से काम लेता तो, आज दर्द इतना न होता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-105

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