काश मुखोटा शराफ़त का उसने पहना न होता,
काश कि उस एक शाम मैं यूंही पिंघला न होता,
थोड़ा दुनियादार, तजुर्बेकार क्यों न हो सका मैं,
बुद्धि से काम लेता तो, आज दर्द इतना न होता।
काश कि उस एक शाम मैं यूंही पिंघला न होता,
थोड़ा दुनियादार, तजुर्बेकार क्यों न हो सका मैं,
बुद्धि से काम लेता तो, आज दर्द इतना न होता।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-105
No comments:
Post a Comment