31.12.22

P-183 बस कैलेंडर जैसी

बस, केलेंडर जैसी होके रह गईं हैं ये ज़िन्दगियां हमारी,
बीती जा रहीं हैं पन्ना-पन्ना बदल के ज़िन्दगियां हमारी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-183

30.12.22

M-044 तोड़ दिया गया हूँ

 तोड़ दिया गया हूँ, बिखेर दिया गया हूँ मैं,
जब भी तय सीमा से बाहर आ गया हूँ मैं,
अजब कायदे कानून लागू हैं मुझ पर,
दुनिया है आज़ाद, कटघरे में आ गया हूँ मैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-044

28.12.22

P-182 ईश्वर ने जो देना था

ईश्वर ने जो देना था दिया,जो है तुम संभालो इसको।
अब जीवन तुम पर निर्भर, बिगाड़ो या बनालो इसको।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-182

26.12.22

P-181 सर्द मौसम में

सर्द मौसम में बामुश्किल आई थी जो  धूप मेरे आंगन में,
उस बेवफ़ा को भी दीवारों से जाती देखते रह गए हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-181

S-216 इश्क़ मुकम्मल होता

इश्क़ मुकम्मल होता तब नज़र आता है,
दरिया ऐ ग़म हद से जब गुज़र जाता है।

- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-216

P-180 तुम क्या जानो

तुम क्या जानो दर्दे-जुदाई 
अभी तुमने हमे खोया ही कहाँ है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-180

S-215 आज फिर एक बार

आज फिर एक बार नज़र डाली हाथ की लकीरों पर,
बरसों बाद जब निगाह गई उसकी पुरानी तस्वीरों पर।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-215

24.12.22

S-214 शायद मसरूफ़

मसरूफ़ होगा वो, मेरे जनाज़े में न हो सका शामिल,
"अजनबी", शायद तेरी मौत उसकी फ़ुर्सत में ना हुई।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-214

23.12.22

S-213 मयकशी से तो

मयकशी से तो मुस्तक़िल तौबा कर ली मैंने, 
तेरे दीदार ही कर लेता हूँ मयनोशी की सूरत से।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-213

18.12.22

T-030 एक ही शिकायत

एक ही शिकायत रही खुदा से,
इंसान को ख्वाहिशें दीं ही क्यों,
जब तू पूरी कर ही नहीं सकता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-030

15.12.22

S-212 बद दुआओं पर

 
बद दुआओं पर हमारा यकीं न था, पर करना पड़ा,
आज जब ख़ुद पर इनका असर होते देखा। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-212

S-211 हमे नीचा दिखाने में

हमे नीचा दिखाने में क्यों लगे हो,
हम तुम्हारे हमक़द हो नहीं सकते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-211

S-210 ख़ामोशी नाते तो

ख़ामोशी नाते तो खत्म कर सकती है,
मगर इससे रिश्ते कभी खत्म नहीं हुआ करते। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-210

S-209 बन्द न कर रास्ते

बंद न कर रास्ते गुफ्तगू के,
खैरियत जानने की गुंजाइश तो रख।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-209

P-179 इस दिल को

इस दिल को मालूम है आपकी खैरियत,
मगर आपसे सुनते तो तस्कीन हो जाती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-179

P-178 बस मैं अपनी

बस मैं अपनी ग़लतियों को
याद करता हूँ,
ये न समझ लेना मैं तुमको
याद करता हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-178

14.12.22

Q-086 कितने सादा मिजाज़

कितने सादा मिजाज़ रहे हम,
तेरे नज़रिए को न समझे हम,
तल्खियों को अनदेखा किया,
खुद ही को दोष देते रहे हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-086

11.12.22

P-177 वक़्त भर देगा

वक़्त भर देगा ज़ख़्मों को, लोग ये कैसे बोल देते हैं,
यहां तो मुद्दतों पुराने ज़ख़्म आज ही मिले जैसे लगते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-177

P-176 यूं तो सब अपने

यूं तो सब अपने-अपने लिए जीते हैं, मगर
हम तो ये ज़िन्दगी आपके नाम किये देते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-176

10.12.22

T-029 एक सीमा तो हो

एक सीमा तो हो दर्द की,
वरना फ़र्क ही न रहेगा,
ज़िन्दगी और मौत में। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-029

8.12.22

P-175 अब बहारें न आएंगी

अब बहारें न आएंगी इस तरफ़,
आओ ख़िज़ाओं अपनी मंशा पूरी कर लो।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-175

P-174 भला ग़लत कैसे

भला ग़लत कैसे कह दूं मैं तुझको,
मुझमें तुझमे फ़र्क बस दिल-दिमाग का ही तो है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-174

Q-085 बहुत आगे निकल

बहुत आगे निकल गए हैं लोग इश्क़ में,
एक हम ,बस अल्फ़ाज़ पर इटके रहते हैं। 
'तिजारत' में एहसासात की क्या कीमत,
एक हम, कि जज़्बात पकड़के बैठे रहते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-085

S-208 अजनबी उसने बना दिया

अजनबी उसने बना लिया मुझे सिर्फ़ यूं करके,
उसे भी कुछ मुहब्बत सी हुई जा रही थी मुझसे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-208

7.12.22

P-173 यूंतो मोबाइल में

यूंतो मोबाइल में तेरी तस्वीरों का अंबार लगा है
फिर भी तुझे रूबरू देखने का इंतज़ार लगा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी P-173

6.12.22

P-172 तुमने तो सिर्फ़


तुमने तो सिर्फ़ एक मुझको भुला रक्खा है, मगर
मैने तो तुम्हारे वास्ते पूरी दुनियाँ को भुला रक्खा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-172

4.12.22

S-207 ग़ौर से पढ़ मुझे

ग़ौर से पढ़ मुझे, मेरी शायरी में कुछ हक़ीक़त भी छुपी है,
मेरी हर शिकायत में कहीं न कहीं तेरी तारीफ़ भी छुपी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-207

3.12.22

P-171 कुदरत से

कुदरत से इंसाँ की बस एक ही शिकायत रही,
लहू का रंग एक रक्खा, फ़ितरत अलग कर दी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-171

P-170 मुखोटे में उसे

मुखोटे में ही देखने के आदी हो गए थे हम उसे,
मुखोटा हटने पर भी पहचान न पाए हम उसे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-170

S-206 पहले मेरे सब कुछ

पहले मेरे सब कुछ थे आप, मगर आज कुछ नहीं हैं,
दिल में यादें ज़रूर हैं आपकी, पर आप ख़ुद नहीं हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-206


2.12.22

P-169 प्यार और दर्द

प्यार और दर्द दोनों हैं एक जैसी फ़ितरत के,
कितना भी दबाओ, बारबार उठ खड़े होते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-169

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...