बस, केलेंडर जैसी होके रह गईं हैं ये ज़िन्दगियां हमारी,
बीती जा रहीं हैं पन्ना-पन्ना बदल के ज़िन्दगियां हमारी।
बीती जा रहीं हैं पन्ना-पन्ना बदल के ज़िन्दगियां हमारी।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-183
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...