मसरूफ़ होगा वो, मेरे जनाज़े में न हो सका शामिल,
"अजनबी", शायद तेरी मौत उसकी फ़ुर्सत में ना हुई।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-214
"अजनबी", शायद तेरी मौत उसकी फ़ुर्सत में ना हुई।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-214
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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