26.12.22

S-216 इश्क़ मुकम्मल होता

इश्क़ मुकम्मल होता तब नज़र आता है,
दरिया ऐ ग़म हद से जब गुज़र जाता है।

- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-216

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...