31.5.23

P-209 कहने को तो मैं

कहने को तो मैं "अजनबी" हूँ,
पर ये सोचो ये कहता कौन है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-209

27.5.23

S-269 मासूम से मेरा दिल

मासूम सा दिल मेरा इस तरह ना टूट गया होता,
उसका दिल भी अगर उसके चेहरे जैसा होता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-269

23.5.23

P-208 चूहों के हाथ

चूहों के हाथ कत्तर लग गई,अंधों के हाथ बटेर लग गई,
ख़ुद की पूंछ सीधी हुई नहीं, बजरंगी की मरोड़ने चले हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-208

19.5.23

Q-115 सहर हुई भी न थी कि

सहर हुई भी न थी कि फिर शाम हो गई,
फिर वही ग़म वही तन्हाई तमाम हो गई,
मुख़्तसर सा रौशन हुआ था आशियाना,
ज़िन्दगी फिरसे रंजो-ग़म के नाम हो गई।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-115

Q-114 तुमको भूल जाने में

तुमको भूल जाने में अभी देर लगेगी,
दिल को समझाने में अभी देर लगेगी,
दोस्ती तोड़े तुम्हे हो गया अर्सा, मगर
तुम्हे अजनबी मानने में अभी देर लगेगी।

-वीरेंद्र सिन्हा ”अजनबी" Q-114

17.5.23

M-062 मेरे नज़दीक से न गुज़रा

मेरे नज़दीक से न गुज़रा कर ख़ुशी,
मेरे ज़ख्मो को हवा मिल जाती है।
मेरे अपने भी मुझे पहचान नहीं पाते,
मेरे चेहरे पर जब तू खिल जाती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-062

16.5.23

Q-113 इन्हें आंसू समझने की

इन्हें आंसू समझने की भूल न करो जो आँखों से निकल रहें हैं,
ये तो बरसों पुराने ग़म हैं मेरे, जो अब कहीं जाके निकल रहें हैं।
और कब तक संभालकर रखूँ इनको अपनी बेगुनाह आँखों में, 
जिन्होंने दिए थे ये ग़म, वोभी तो अब ज़िन्दगी से निकल रहें हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-113

15.5.23

P-207 कुत्ते सिर्फ़ डरपोक

कुत्ते सिर्फ डरपोक निहत्थों पर ही भोंका करते हैं,
उन पर नहीं जो हाथ में पत्थर उठाए चला करते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-207

P-206 जो दरवाज़े हम

जो दरवाज़े हम दूसरों पर बंद कर देते हैं,
वो ही हमारे लिए भी तो बन्द हो जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-206

14.5.23

P-205 यूंही नहीं मिल जाते

यूंही नहीं मिल जाते इनामो-इकराम, शोहरतो-ख़िताब,
ज़मीर बेच कर के करनी पड़ती हैं ग़द्दारियाँ बेहिसाब।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-205

12.5.23

S-268 दुआ की थी मैंने

दुआ की थी मैंने कि वक्त थम जाए मेरे हसींन दिनों में,
सितम देखिए उसका, वो थमा भी तो मेरे ग़मगीन दिनों में।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-268

Q-112 मुझसे छिपी नहीं थीं

मुझसे छिपी नहीं थीं, अपने हाथों की लकीरें,
फिर तेरे लिए मैंने इतने ख्वाब क्यों सजा लिए।
मैं कभी पढ़ न सका तेरे हाथों की रेखाएं भी,
मै क्या करता, इतनी जल्दी तूने हाथ छुड़ा लिए। 

 -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-112

Q-111 वही रास्ते और वही आसमाँ

वही रास्ते और वही आसमान, पर वो हमसफ़र नहीं,
उजड़ा-उजड़ा, वीराना सा है, हरा भरा वो मंज़र नहीं,
मंज़िल पीछे रह गई, सामने धुंध है और कुछ नहीं,
क्यों न रोक लूं कदम, जब रहा मकसद-ऐ-सफ़र नही।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-111

11.5.23

M-061 क्यों दिल मेरा

क्यों दिल मेरा तुम जला रहे हो,
बारिश में क्यूँ इतना नहा रहे हो,
ख़ुद तो ठिठुर रहे हो तुम ठंड से,
और मुझे आग में सुलगा रहे हो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-061

10.5.23

G-011 जन्म-जन्मों के रिश्तों

जन्म-जन्मों के रिश्तों को भी फिसलते देखा है।
और अक्सर अटूट बंधनों को भी खुलते देखा है।

यूं तो सभी चराग़ रौशनी देते हैं घरों को,
पर कुछ चराग़ों से घरों को भी जलते देखा है।

ख़्वाबों-ख्यालों में बसे लोगों की क्या कहें,
दिलों से हमने उनको भी निकलते देखा है।

बड़ा फ़र्क है ज़मीन और आसमान में,
हमने तो मगर उनको भी मिलते देखा है।

फिसल जाता है रेत मुट्ठी में आकर भी,
हमने बहुतों को हाथ ही मलते देखा है।

काबिल भी नाकाबिल हैं आगे बढ़ने में,
हमने बिन पैर के लोगों को भी चलते देखा है।

वो आंखें जो महरूम हैं रोशनी से "अजनबी",
उन आंखों में भी हमने ख़्वाबों को पलते देखा है।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" G-011
 

9.5.23

M-060 जन्मों के रिश्तों को

जन्मों के रिश्तों को टूटते देखा है,
अटूट बंधनों को भी छूटते देखा है।
रौशनी ही कहाँ देते है सब चराग़,
चराग़ों से घरों को जलते देखा है।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" M-000
 

8.5.23

Q-110 दौर-ए-हाज़िर में,

दौर-ए-हाज़िर में, इंसान वो इंसान नहीं रहा,
ख़ुदगर्ज़ हो गया है, उसका ईमान नहीं रहा।
तार तार हो रही  इंसानियत रोज़ हर सिम्त,
तब्दीली का शायद कोई इम्कान नहीं रहा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-110
 

S-267 तुम मिले थे तो

तुम मिले थे तो कुछ ज़िन्दगी जी ली मैने,
वरना मेरे ग़म कहाँ मोहलत देते हैं इतनी भी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-267

7.5.23

S-266 मुश्किलें भले ही

मुश्किलें भले ही खत्म न हों किसी की,
हाल पूछ लेने से राहत तो मिल जाती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-266

6.5.23

S-265 माना कि ख़ामोशी

माना कि ख़ामोशी ना तोड़ने की ज़िद है तुम्हारी,
पर किसी का दिल रखने को, मुस्कुरा तो सकते हो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-265

5.5.23

S-264 मैं तो समझा था,

मै तो समझा था, चल न पाओगे तुम एक कदम मेरे बिना,

तुमने तो मगर एक नई दुनियां ही बसा ली सनम मेरे बिना।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-264


S-263 कोशिश न करना

कोशिश न करना ऐ ख़ुशी, मुझे मेरे ग़मों से जुदा करने की,
तू पल भर की मेहमाँ है, इन्होंने तो ताउम्र साथ निभाया है।

   -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-263

1.5.23

S-262 हाथ छुड़ाने से

हाथ छुड़ाने से ही साथ छूट जाए, ज़रूरी नहीं,
साथ रहके भी तो लोग बिछुड़े हुए से रहते हैं। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-262

S-261 दिमाग़ में नफरत

दिमाग मे नफ़रत, पर दिल मे मुहब्बत,
दिलो-दिमाग़ में इतना इख़्तिलाफ़ क्यों है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-261

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...