सहर हुई भी न थी कि फिर शाम हो गई,
फिर वही ग़म वही तन्हाई तमाम हो गई,
मुख़्तसर सा रौशन हुआ था आशियाना,
ज़िन्दगी फिरसे रंजो-ग़म के नाम हो गई।
फिर वही ग़म वही तन्हाई तमाम हो गई,
मुख़्तसर सा रौशन हुआ था आशियाना,
ज़िन्दगी फिरसे रंजो-ग़म के नाम हो गई।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-115
No comments:
Post a Comment