19.5.23

Q-115 सहर हुई भी न थी कि

सहर हुई भी न थी कि फिर शाम हो गई,
फिर वही ग़म वही तन्हाई तमाम हो गई,
मुख़्तसर सा रौशन हुआ था आशियाना,
ज़िन्दगी फिरसे रंजो-ग़म के नाम हो गई।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-115

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