10.5.23

G-011 जन्म-जन्मों के रिश्तों

जन्म-जन्मों के रिश्तों को भी फिसलते देखा है।
और अक्सर अटूट बंधनों को भी खुलते देखा है।

यूं तो सभी चराग़ रौशनी देते हैं घरों को,
पर कुछ चराग़ों से घरों को भी जलते देखा है।

ख़्वाबों-ख्यालों में बसे लोगों की क्या कहें,
दिलों से हमने उनको भी निकलते देखा है।

बड़ा फ़र्क है ज़मीन और आसमान में,
हमने तो मगर उनको भी मिलते देखा है।

फिसल जाता है रेत मुट्ठी में आकर भी,
हमने बहुतों को हाथ ही मलते देखा है।

काबिल भी नाकाबिल हैं आगे बढ़ने में,
हमने बिन पैर के लोगों को भी चलते देखा है।

वो आंखें जो महरूम हैं रोशनी से "अजनबी",
उन आंखों में भी हमने ख़्वाबों को पलते देखा है।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" G-011
 

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