जन्मों के रिश्तों को टूटते देखा है,
अटूट बंधनों को भी छूटते देखा है।
रौशनी ही कहाँ देते है सब चराग़,
चराग़ों से घरों को जलते देखा है।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" M-000
अटूट बंधनों को भी छूटते देखा है।
रौशनी ही कहाँ देते है सब चराग़,
चराग़ों से घरों को जलते देखा है।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" M-000
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