दौर-ए-हाज़िर में, इंसान वो इंसान नहीं रहा,
ख़ुदगर्ज़ हो गया है, उसका ईमान नहीं रहा।
तार तार हो रही इंसानियत रोज़ हर सिम्त,
तब्दीली का शायद कोई इम्कान नहीं रहा।
ख़ुदगर्ज़ हो गया है, उसका ईमान नहीं रहा।
तार तार हो रही इंसानियत रोज़ हर सिम्त,
तब्दीली का शायद कोई इम्कान नहीं रहा।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-110
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