वही रास्ते और वही आसमान, पर वो हमसफ़र नहीं,
उजड़ा-उजड़ा, वीराना सा है, हरा भरा वो मंज़र नहीं,
मंज़िल पीछे रह गई, सामने धुंध है और कुछ नहीं,
क्यों न रोक लूं कदम, जब रहा मकसद-ऐ-सफ़र नही।
उजड़ा-उजड़ा, वीराना सा है, हरा भरा वो मंज़र नहीं,
मंज़िल पीछे रह गई, सामने धुंध है और कुछ नहीं,
क्यों न रोक लूं कदम, जब रहा मकसद-ऐ-सफ़र नही।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-111
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