मुझसे छिपी नहीं थीं, अपने हाथों की लकीरें,
फिर तेरे लिए मैंने इतने ख्वाब क्यों सजा लिए।
मैं कभी पढ़ न सका तेरे हाथों की रेखाएं भी,
मै क्या करता, इतनी जल्दी तूने हाथ छुड़ा लिए।
फिर तेरे लिए मैंने इतने ख्वाब क्यों सजा लिए।
मैं कभी पढ़ न सका तेरे हाथों की रेखाएं भी,
मै क्या करता, इतनी जल्दी तूने हाथ छुड़ा लिए।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-112
No comments:
Post a Comment