30.12.21

S-068 मुहब्बत हुई भी

मुहब्बत हुई भी तो देखो किससे,
बे-जज़्बात बे-दिल है जो, उससे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-068

29.12.21

S-067 मेरा वजूद कम

मेरा वजूद कम न आंक, मैं रौशन चिराग हूँ
भटके के लिए रोशनी, टेढ़े के लिए आग हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-067

27.12.21

P-042 किस्मत में तकलीफ़ात

किस्मत में तकलीफ़ात ही चल रही हैं,
दुआ देने वाला जो अब कोई रहा नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-042

26.12.21

Q-036 ये मेरा दर्द

ये मेरा दर्द बड़ा ग़म दे रहा है,
कैसी मायूसी हरदम दे रहा है,
भूल क्यों नहीं जाता ये मुझे,
हर रोज़ नया ज़ख़्म दे रहा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-036

Q-035 याद उसको ही

याद उसको ही करता रहा मैं,
बेवफ़ा जिसको कहता रहा मैं,
ये दिल उधर ही खिंचता गया,
जिधर जाने से रोकता रहा मैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-035

22.12.21

P-041दर्दभरी दुनियां

दर्दभरी दुनियां में सभी पराए हो जाते हैं,
बस एक दर्द ही है, जो पराया नहीं होता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-041

17.12.21

P-040 अच्छी-बुरी यादें

अच्छी-बुरी यादें कभी मरती नहीं,
मगर इंसाँ को ज़रूर मार देती हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-040


T-014 जीने का शऊर

जीने का शऊर आता नहीं,
ठोकरें खा लीं हैं इस कदर,
घमंड फिर भी जाता नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-026

16.12.21

Q-034 मुझे मालूम है

मुझे मालूम है कि आप बेवफ़ा हो गए,
मगर, ये मैं किसी से कह नहीं सकता।
बाख़ुशी सहन कर लूंगा तमाम रंजो-ग़म,
आप पर कोई हर्फ़, मैं सह नहीं सकता।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-040

13.12.21

Q-033 मैं जानता हूँ

मैं जानता हूँ, मैं ख़्वाब देख रहा हूँ,
हसीं धोखा ख़ुदको आज दे रहा हूँ,
मिले न मिले मुस्तक़िल ख़ुशी मुझे,
पल दो पल झूंटी तसल्ली दे रहा हूं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-048



12.12.21

P-039 हर रोज़

हर रोज़ इस तराह इंसानों का खूँखारों में परिवर्तन हो रहा है,

मानो जैसे जंगलों से शहरों में खूँखारों का पलायन हो रहा है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-039


9.12.21

T-013 हर किसी से अब

हर किसी से अब ये दिल नहीं मिलता,

अब बस उन्हीं को चाहता हूँ मैं,

रुख जिनका हवाओं से नहीं बदलता।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-013


8.12.21

S-066 तूने तो कोई

तूने तो कोई कमी न छोड़ी थी, ए ज़िन्दगी, हमे फ़नाह करने में,
इसी को एहसान समझ हमारा, तुझे हम फिरभी जिये जा रहे हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-066

7.12.21

T-012 बड़ा अच्छा है

बड़ा अच्छा है तू ऊंचाइयां छू जाए,
वजूद को बना ऊंचा, सिर्फ समझ मत,
कहीं ज़माने से अलग, पड़ न तू जाए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  T-012

P-038 मत सींचो

मत सींचो उसी पौधे को, जिससे बंधा है तुम्हारे गले का फंदा।

पेड़ बनकर एकदिन यही पौधा खींच लेगा तुम्हारे गले का फंदा।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-038

P-037 मैं किताबों में

मैं किताबों में  नहीं, ज़मीर में रहता हूँ,
मुझे महसूस करो पढ़ने की ज़रूरत नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-037

S-065 महज़ उजालों के

महज़ उजालों के मुरीदों, ज़रूरी तो ज़िन्दगी में थोड़े से अंधेरे भी हैं,

सफ़र-ऐ-ज़िन्दगी के दौराँ, हरेक रौशनी में लिपटे थोड़े से अंधेरे भी हैं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-065

6.12.21

S-064 वही नहीं रहते

वही नहीं रहते ज़हन में, जो दिल मे रहते हैं,
वोभी रहते हैं, जो दिल से उतर गए रहते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-064

T-011 तेरी ही मर्ज़ी

तेरी ही मर्ज़ी से सारी दुनियां चले, 
ये ज़रूरी नहीं,
दुनियां की भी तो अपनी रज़ा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  T-011

S-063 दुश्मनों से

दुश्मनों से बच सकते हो, खुद से बचना है मुश्किल।
न बढ़ाओ यादों का दायरा,यादों को भूलना है मुश्किल।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-063

5.12.21

P-036 महंगे नहीं आइने

महंगे नहीं आईने इतने भी,

जो घर मे रखने मुश्किल हो जाएं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-036

T-010 इंसाँ पे इतना

इंसाँ पर रहम इतना हो,
ज़रा धीरे से बदले कोई,
ज़रूरी अगर बदलना हो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-010

3.12.21

P-035 यह तो सही है,

यह तो सही है, अब वक्त बदल गया है,

पर इंसाँ तो बगैर ज़रूरत बदल गया है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-035

S-062 वक्त उसका

वक्त उसका बड़ा अच्छा गुज़र गया,
क्या हुआ जो कोई तन्हा गुज़र गया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-062

2.12.21

Q-032 झूंट ना मुस्कुरा

झूंट ना मुस्कुरा इतना तू "अजनबी",
ये मत भूल तू एक खुली किताब है।
ये ज़माने वाले हैं बहुत तजुर्बेयाफ्ता,
ताड़ लेंगे तू ग़मज़दा है या शादाब है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-032

P-034 बहारें जब भी

बहारें जब भी आती हैं, मेरा पता भूल जाती हैं,
सबको देके कुछ न कुछ, वहीं से लौट जाती हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-034

G-005 बर्बाद तो हम

बर्बाद हम खुद हुए,
फिर आप क्यों शर्मसार बैठे हैं।

सज़ा हमको मिली,

तो  आप क्यों ख़तावार बैठे हैं।


हम ही दरबदर हुए,

भला आप  क्यों बेज़ार बैठे हैं।


क्यों लें आप तोहमतें,

यहां हम जो  ख़ाकसार बैठे हैं।


कितने देगा ग़म ज़माना,

जब हम जैसे ग़मगुसार बैठे हैं।


हम नहीं हक़दार आपके,

इसीलिए तो बेइख़्तियार बैठे है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-005


K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...