31.5.21

S- 004 खत्म सी हो

खत्म सी हो रही है जुम्बिश सीने में, किस लिए,

शायद उठके जारहा है कोई कूंचा ऐ दिल से, इस लिए।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-004


Q-008 रुकी रुकी सही

रुकी रुकी सही फिर भी चल रही सांस है,

बुझी बुझी सही फिर भी थोड़ी सी आस है

थमी थमी हैं दिल की धड़कनें "अजनबी"

उसके आने का इन्हें  फिर भी कयास है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-008


28.5.21

S- 009 बड़ी दुश्वार

बड़ी दुश्वार हुआ करती हैं कुछ मजबूरियां,

उन्हें छुपाने की भी होती हैं बहुत मजबूरियां।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-009


26.5.21

M- 002 चुनाव-कला

चुनाव-कला  हिट, कभी अख़लाक़, कभी रोहित,

सत्ता सुख के मार्ग में चाहे,अन्य मरे, या मरे दलित.

झूंट सेक्युलरिज्म की रट बार बार लगती रहे,

भले ही दर-बदर फिरते रहे कोई कश्मीरी पंडित 

- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"   M-002


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25.5.21

S- 008 मुहब्बत भी थी

मुहब्बत भी थी,  हंसी मंज़र भी थे, आरज़ुएं भी थीं,
अब सिर्फ़ यादें हैं, दीगर चीज़ का नामोनिशाँ नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-008

23.5.21

S- 007 वक्त की रफ्तार

वक्त की रफ्तार को क्या कहिए,
एक झोंके में मयार बदल देता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-007

S-006 अजीब है हम

अजीब हैं हम,  हमने भी अजूबे क्या क्या किये,
ख़ुद को ही खो कर, ख़ुद को ही ढूंढा किये।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-006

22.5.21

Q-007 सीधा सच्चा

सीधा सच्चा भी चले तो मुसीबत है आदमी की,
पुरसुकूँ रास्ता नहीं क्या कैफ़ियत है आदमी की
"अजनबी" तू बदलना भी चाहे तो मुमकिन नहीं,
ख़ुदा के सामने भला क्या हैसियत है आदमी की।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-007

Q-006 होंसलों को

होंसलों को आप बुलंद रखिये,
उम्मीदें ज़माने से कम रखिये,
टूटे गर भरोसा अपनों पर से,
तो ख़ुदा पर तो कायम रखिये।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-006

20.5.21

S- 005 नसीहत एक बड़ी

नसीहत एक बड़ी छोड़कर गया है वो आज दूसरों के लिए,
ख़ुद ही दफ़्न है वो यहां खोदे थे गड्ढे जिसने दूसरों के लिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-005

18.5.21

Q-005 इश्क वाले

इश्क वाले दिल देखते हैं,
भला उम्र में क्या रखा है।
शोख़ रानाइयों के सामने,
उम्र की गिनती में क्या रखा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-005

M- 001 दुनियां जाए भाड़ में

दुनियां जाए भाड़ में,
मुझे तो कृष्ण और श्याम प्यारे।
उनकी बात है निराली,
उन्हीं के काम, उन्हीं के नाम प्यारे। 

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  M-001

16.5.21

Q-004 न किसी शख्स

न किसी शख्स में चाहने की कूबत है,
न किसी मे चाहत पाने की सलाहियत है। 
दौरे-हाज़िर में सब हैं तिजारती लोग,
मौकापरस्तों और खुदगर्ज़ों की सल्तनत है।

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-004

7.5.21

S-003 ग़म आए तो

ग़म आए तो एक-आध खुशी भी आई है, चाँद भी तो आया है, अगर  रात भी आई है।

वीरेंद्र सिंह "अजनबी" S-003


6.5.21

Q-003 मेरे 'अपने' हर हाल में

मेरे 'अपने' हर हाल में, मेरा हाल जान लेते हैं।

मेरी मुस्कुराहट में भी, मेरा दर्द पहचान लेते हैं।

बात को कितना भी घुमाफिरा कर पेश कर दूँ,

वो ज़हीन जो ठहरे, सही मतलब जान लेते हैं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-003


5.5.21

S-002 अगर आज बेवफ़ा

अगर आज बेवफ़ा हुआ तो गिला कैसा,
वफ़ादार भी तो रहा वो इतने दिन  तक।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-002

3.5.21

Q- 002 दुरुस्त है

दुरुस्त है, अपनों की सख्तियां और तल्खियाँ भी झिल जातीं हैं,
वरना इनसे निजात पाने में तो ज़िंदगियाँ भी निकल जातीं हैं,
बहुत सोचा किये, अपने लिए भी कभी जी पाएंगे हम,
जद्दोजहद में इसकी मगर सदियाँ निकल जाती हैं।

-वीरेंद्र सिंह "अजनबी" 0-002

2.5.21

Q- 001 मैं दरिया हूँ

मैं दरिया हूँ, तूने मुझे इक सहरा ही माना है।
मैं समुंदर हूँ पर तूने मुझे क़तरा ही जाना है।
एहसासे-कमतरी यूं न दिलाया कर मुझको,
तुझे आईना है काफ़ी,तुझको यही बताना है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"   Q-001

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...