खत्म सी हो रही है जुम्बिश सीने में, किस लिए,
शायद उठके जारहा है कोई कूंचा ऐ दिल से, इस लिए।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-004
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
खत्म सी हो रही है जुम्बिश सीने में, किस लिए,
शायद उठके जारहा है कोई कूंचा ऐ दिल से, इस लिए।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-004
रुकी रुकी सही फिर भी चल रही सांस है,
बुझी बुझी सही फिर भी थोड़ी सी आस है
थमी थमी हैं दिल की धड़कनें "अजनबी"
उसके आने का इन्हें फिर भी कयास है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-008
बड़ी दुश्वार हुआ करती हैं कुछ मजबूरियां,
उन्हें छुपाने की भी होती हैं बहुत मजबूरियां।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-009
चुनाव-कला हिट, कभी अख़लाक़, कभी रोहित,
सत्ता सुख के मार्ग में चाहे,अन्य मरे, या मरे दलित.
झूंट सेक्युलरिज्म की रट बार बार लगती रहे,
भले ही दर-बदर फिरते रहे कोई कश्मीरी पंडित
- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-002
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ग़म आए तो एक-आध खुशी भी आई है, चाँद भी तो आया है, अगर रात भी आई है।
वीरेंद्र सिंह "अजनबी" S-003
मेरे 'अपने' हर हाल में, मेरा हाल जान लेते हैं।
मेरी मुस्कुराहट में भी, मेरा दर्द पहचान लेते हैं।
बात को कितना भी घुमाफिरा कर पेश कर दूँ,
वो ज़हीन जो ठहरे, सही मतलब जान लेते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-003
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...