दुरुस्त है, अपनों की सख्तियां और तल्खियाँ भी झिल जातीं हैं,
वरना इनसे निजात पाने में तो ज़िंदगियाँ भी निकल जातीं हैं,
बहुत सोचा किये, अपने लिए भी कभी जी पाएंगे हम,
जद्दोजहद में इसकी मगर सदियाँ निकल जाती हैं।
वरना इनसे निजात पाने में तो ज़िंदगियाँ भी निकल जातीं हैं,
बहुत सोचा किये, अपने लिए भी कभी जी पाएंगे हम,
जद्दोजहद में इसकी मगर सदियाँ निकल जाती हैं।
-वीरेंद्र सिंह "अजनबी" 0-002
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