7.5.21

S-003 ग़म आए तो

ग़म आए तो एक-आध खुशी भी आई है, चाँद भी तो आया है, अगर  रात भी आई है।

वीरेंद्र सिंह "अजनबी" S-003


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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...