चुनाव-कला हिट, कभी अख़लाक़, कभी रोहित,
सत्ता सुख के मार्ग में चाहे,अन्य मरे, या मरे दलित.
झूंट सेक्युलरिज्म की रट बार बार लगती रहे,
भले ही दर-बदर फिरते रहे कोई कश्मीरी पंडित
- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-002
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ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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