25.5.21

S- 008 मुहब्बत भी थी

मुहब्बत भी थी,  हंसी मंज़र भी थे, आरज़ुएं भी थीं,
अब सिर्फ़ यादें हैं, दीगर चीज़ का नामोनिशाँ नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-008

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...