सीधा सच्चा भी चले तो मुसीबत है आदमी की,
पुरसुकूँ रास्ता नहीं क्या कैफ़ियत है आदमी की
"अजनबी" तू बदलना भी चाहे तो मुमकिन नहीं,
ख़ुदा के सामने भला क्या हैसियत है आदमी की।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-007
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
No comments:
Post a Comment