वो भी क्या दिन थे, जब हम 'बुरे 'नहीं थे,
सुनते थे लोग हमें भी, हम 'बेसुरे' नहीं थे।
सुनते थे लोग हमें भी, हम 'बेसुरे' नहीं थे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-229
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-079
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...