28.11.23

P-229 वो भी क्या दिन थे

वो भी क्या दिन थे, जब हम 'बुरे 'नहीं थे,
सुनते थे लोग हमें भी, हम 'बेसुरे' नहीं थे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-229

26.11.23

Q-145 अब हमें नज़रंदाज़

अब हमें तल्ख़ियों से मुहब्बत हो गई है।
नज़रंदाज़ होने की भी आदत हो गई है।
जिन्हें नाज़ है ख़ुद पर, वो सुन लें इतना,
हमें भी नाज़नीनों से अदावत हो गई है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-145

M-079 देर कर दी तुमने,

देर कर दी तुमने, अब जा कर प्यार तुम्हे मुझ पर आया,
अबतो भावनाओं का दाह-संस्कार भी मैं खुद कर आया,
यह देखो मेरी मृत-भावनाओं के अवशेषों का कलश,
नदी में विसर्जित करके अभी अभी मैं वापस घर आया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  M-079

25.11.23

S-291 जब सहन न हो

 जब सहन न हो दोस्तों का नज़रंदाज़ करना,
तो बेहतर है ख़ुद को अजनबी मंजूर करना।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-291

23.11.23

Q-144 नहीं होता कोई

नहीं होता कोई मुतास्सिर ऊंची आवाज़ से।
शाइस्तगी तो आती है दबे-दबे अल्फ़ाज़ से।
ऊँचाईंयां नहीं होतीं हासिल बगैर जद्दोजहद,
आसमाँ छुआ नहीं जाता ख़्याली परवाज़ से।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" Q-144


20.11.23

S-290 यह माना कि

यह माना कि थोड़ा इत्तिलाफ़ तेरे मेरे बीच कहीं था,
पर पलटके भी जो न देखे तू ऐसा भी दोस्त नहीं था।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-290

11.11.23

K-013 यह कैसा मस्त-मौजी

यह कैसा मस्त-मौजी परिवर्तन हो रहा है,
धर्मनिरपेक्ष भी "धार्मिक" जन हो रहा है।

धर्म-करम  का वृहद आयोजन हो रहा है।
धर्म के संग, कर्म का भी चलन हो रहा है।

आस्थाएं तीव्र हो रही हैं सब के मन में,
नीरसता का अब कोई काम नहीं धर्म में,

ऐ नास्तिकों तुम भी आस्तिक हो जाओ,
सभी का घर-वापसी को मन हो रहा है।

देश धर्म संस्कृति सब रख दिए ताक़ पर,
सत्तासुख के लिए अनैतिक दंगल होरहा है। 

लड़ने को एक व्यक्ति के युगपुरुषत्व से,
विरोधी विचारधाराओं का संगम होरहा है।

-(वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  K-013)




9.11.23

P-228 कुछ अनजाने, कुछ देर को

कुछ अनजाने जो कुछ देर को, कुछ-कुछ अपने हो गए,
हालात के कुछ ही झोंकों में वो जाने कहाँ फुर्र से हो गए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-228

Q-143 वो इश्क़ भी क्या

वो इश्क भी क्या जिसमे इंसाँन डरा-डरा रहे।
रुकें न हसीनों के सितम, ज़ख़्म हरा-हरा रहे।
उस मंज़िल से भी क्या हासिल, ऐ "अजनबी",
जिस पर पहुंच कर भी बशर तन्हा-तन्हा रहे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-143


8.11.23

P-227 ख़ुदा की नियामत

खुदा की नियामत हैं, इनको बोझ न समझो,
बड़ी मेहनत का फल हैं इन्हें बोझ न समझो,
छुपा कर रखो इन बेशकीमती अमानतों को,
नुमाइश करने का इनको सामान न समझो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-227



Q-142 ख़ुदा ने ख़ुद ही

ख़ुदा ने ख़ुद ही इंसाँ के साथ बड़ी बेइंसाफ़ी की है,
किसी को इंसानियत नहीं दी, किसी को भर भर के दी है।
एहसासो-जज़्बात बांटते वक्त भी उसने की तरफ़दारी,
किसी को बना दिया संगदिल तो किसी को नरमदिली दी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-142

7.11.23

S-289 आप हों सामने,

आप हों सामने, हम आंख बंद कर लें, ये आपकी भूल है।
वो क्या चलाएगा खंजर आप पर जो आपका मक़तूल है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-289

Q-141 बिछड़ जाने पर

बिछड़ जाने पर नहीं होती उतनी तकलीफ़, 
जितनी नज़रअंदाज़ किए जाने पर होती है।
बयाँ भी नहीं होती ये हक़ीक़त "अजनबी",
यह तो महसूस, ख़ुद चोट खाने पर होती है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-141

6.11.23

S-288 मैं क्यों भला किसी को

मैं क्यों भला किसी को आइना दिखाऊं,
जब मेरे पास विकल्प है कि मैं उसे भूल जाऊं।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी"  S-288

5.11.23

M-078 कुछ लोग ज़िन्दगी में

कुछ लोग ज़िन्दगी में यूं आते हैं,
ख़ुशी के पीछे दर्द तमाम लाते हैं।
ख़ुदा जाने क्या खोजते हैं हम में,
इस कदर हमें क्यों आज़माते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-078

4.11.23

Q-140 तुम भी हो अपनी

तुम भी हो अपनी जगह सही,
पर मैं भी अपनी जगह सही हूँ।
मेरा दिल अब भी नहीं मानता,
मैं तुंम्हारे लिए अब अजनबी हूँ।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" Q-140

Q-139 ख़ुश फ़हमी में झूंटी

ख़ुशफ़हमी में झूंटी 'वाह' को सच मान लेता हूँ।
मैं हर मस्नूई मुस्कुराहट को सच मान लेता हूँ।
हसीनों के हर ज़ाहिरा झूंट को समझ कर भी,
बार-बार उनकी हर बात को सच मान लेता हूँ।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-139

1.11.23

P-226 इतना ज्यादा भी

इतना ज़्यादा भी मूल्य न दो किसी को, "अजनबी",
कि वो ख़ुद से भी ज़्यादा तुम्हे फ़ालतू समझने लगे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-226

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...