यह कैसा मस्त-मौजी परिवर्तन हो रहा है,
धर्मनिरपेक्ष भी "धार्मिक" जन हो रहा है।
धर्मनिरपेक्ष भी "धार्मिक" जन हो रहा है।
धर्म-करम का वृहद आयोजन हो रहा है।
धर्म के संग, कर्म का भी चलन हो रहा है।
आस्थाएं तीव्र हो रही हैं सब के मन में,
नीरसता का अब कोई काम नहीं धर्म में,
ऐ नास्तिकों तुम भी आस्तिक हो जाओ,
सभी का घर-वापसी को मन हो रहा है।
देश धर्म संस्कृति सब रख दिए ताक़ पर,
सत्तासुख के लिए अनैतिक दंगल होरहा है।
लड़ने को एक व्यक्ति के युगपुरुषत्व से,
विरोधी विचारधाराओं का संगम होरहा है।
-(वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-013)
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