तुम भी हो अपनी जगह सही,
पर मैं भी अपनी जगह सही हूँ।
मेरा दिल अब भी नहीं मानता,
मैं तुंम्हारे लिए अब अजनबी हूँ।
पर मैं भी अपनी जगह सही हूँ।
मेरा दिल अब भी नहीं मानता,
मैं तुंम्हारे लिए अब अजनबी हूँ।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" Q-140
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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