नहीं होता कोई मुतास्सिर ऊंची आवाज़ से।
शाइस्तगी तो आती है दबे-दबे अल्फ़ाज़ से।
ऊँचाईंयां नहीं होतीं हासिल बगैर जद्दोजहद,
आसमाँ छुआ नहीं जाता ख़्याली परवाज़ से।
शाइस्तगी तो आती है दबे-दबे अल्फ़ाज़ से।
ऊँचाईंयां नहीं होतीं हासिल बगैर जद्दोजहद,
आसमाँ छुआ नहीं जाता ख़्याली परवाज़ से।
-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" Q-144
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