23.11.23

Q-144 नहीं होता कोई

नहीं होता कोई मुतास्सिर ऊंची आवाज़ से।
शाइस्तगी तो आती है दबे-दबे अल्फ़ाज़ से।
ऊँचाईंयां नहीं होतीं हासिल बगैर जद्दोजहद,
आसमाँ छुआ नहीं जाता ख़्याली परवाज़ से।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" Q-144


No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...