वो इश्क भी क्या जिसमे इंसाँन डरा-डरा रहे।
रुकें न हसीनों के सितम, ज़ख़्म हरा-हरा रहे।
उस मंज़िल से भी क्या हासिल, ऐ "अजनबी",
जिस पर पहुंच कर भी बशर तन्हा-तन्हा रहे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-143
रुकें न हसीनों के सितम, ज़ख़्म हरा-हरा रहे।
उस मंज़िल से भी क्या हासिल, ऐ "अजनबी",
जिस पर पहुंच कर भी बशर तन्हा-तन्हा रहे।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-143
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