26.11.23

Q-145 अब हमें नज़रंदाज़

अब हमें तल्ख़ियों से मुहब्बत हो गई है।
नज़रंदाज़ होने की भी आदत हो गई है।
जिन्हें नाज़ है ख़ुद पर, वो सुन लें इतना,
हमें भी नाज़नीनों से अदावत हो गई है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-145

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...