अब हमें तल्ख़ियों से मुहब्बत हो गई है।
नज़रंदाज़ होने की भी आदत हो गई है।
जिन्हें नाज़ है ख़ुद पर, वो सुन लें इतना,
हमें भी नाज़नीनों से अदावत हो गई है।
नज़रंदाज़ होने की भी आदत हो गई है।
जिन्हें नाज़ है ख़ुद पर, वो सुन लें इतना,
हमें भी नाज़नीनों से अदावत हो गई है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-145
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