ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
23.8.21
M-005 नज़दीकियों ने
P-013 कुदरत से हम
कुदरत से हम छेड़-छाड़ कर सकते हैं, बदल नहीं सकते,
फ़ितरत इंसाँ की कम ज़्यादा कर सकते हैं, बदल नहीं सकते।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-013
15.8.21
M-004 अगर आपकी
अगर आपकी ये आन है,
तो हमारी भी ये शान है,
भुला देंगे आपको अगर,
आपको कोई अभिमान है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-004
12.8.21
P-015 ये रोशनी
ये रोशनी खुद ब खुद कहाँ से आ रही है छनकर?
कहीं तुम तो नहीं आ गए मेरे अंधेरों में रोशनी बनकर?
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-015
10.8.21
M-010 न वक्त ठहरा है
न वक्त ठहरा है, न तुम ही ठहरे हो,
बस बेचारी ज़िन्दगी ही ठहर गई है।
खुशी रहा करती थी जिन चेहरों पर,
आज वहां संजीदगी ही ठहर गई है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-010
6.8.21
M-011 भूले हुओं को
T-004 अब नहीं उम्मीद
5.8.21
M-013 दीपावली मुबारक
M-012 कुछ पटाखे
कुछ पटाखे छोड़े जाते हैं,
और कुछ को छोड़ा नहीं जाता,
कुछ में आग लगाई जाती है,
कुछ में लगी लगाई आती है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-012
S- 037 मेरे दर्द-ओ-ग़म
मेरे दर्द-ओ-ग़म किसी शायरी से कम नहीं,
खुद मिलती है दाद उन्हें मोहताज हम नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-037
4.8.21
Q-020 तुम क्यों हो जाते हो
भला वो क्यों हो जाते हो रुसवा इनसे,
मेरे ये आसूं तो आदतन बह जाते हैं।
बेइंतहा फ़राख़-दिल हैं ये मेरे आंसू,
हरेक के लिए दफ़्फ़ातन बह जाते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-020
S- 036 अक़ीदत जितनी
M-014 किताबो की बातों
किताबों की बातों से हटकर,
कहता मैं सच्ची बात ये खुलकर।
जीवन बड़ा कष्टमय है यदि वो,
जिया जाय भावनाओं में बहकर।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-014
3.8.21
M-003 सर पर जब
S- 035 दिए हैं आज
S-034 तू जो ऐसा हो गया
तू जो ऐसा हो गया, इसमें तेरी कोई ख़ता नहीं,
ये ज़माने के सितम हैं, इनसे बच कोई सका नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-034
1.8.21
Q- 021 ज़ुबाँ रखता हूँ
K-007 सूरज को मैं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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चार दिन में ही वापस आ धमके मेरे तमाम ग़म, बड़ा शौक सा चरमराया था मुझे ख़ुश रहने का। -वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-276
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बुझे चराग़ का यह धुआं बता रहा है, अभी अभी ख़त्म हुई है दास्ताँ कोई, तन्हाई में लिपटा सन्नाटा जता रहा है, अभी अभी यहाँ से गुज़रा है तूफ़ां क...
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कोई शिकायत न रही ज़माने से। जब से रु-ब-रु हुए हैं आयने से। -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-233