23.8.21

M-005 नज़दीकियों ने

नज़दीकियों ने बनाए थे जो रिश्ते,
ये दूरियां न तोड़ पाएंगी वो रिश्ते,
जहां भी जाकर तुम रहो मेरे यार,
याद रखना भूल न जाना, वो रिश्ते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  M-005

P-013 कुदरत से हम

कुदरत से हम छेड़-छाड़ कर सकते हैं, बदल नहीं सकते,

फ़ितरत इंसाँ की कम ज़्यादा कर सकते हैं, बदल नहीं सकते।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-013





15.8.21

M-004 अगर आपकी

अगर आपकी ये आन है,

तो  हमारी भी ये शान है,

भुला देंगे आपको अगर,

आपको कोई अभिमान है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-004


12.8.21

P-015 ये रोशनी

ये रोशनी खुद ब खुद कहाँ से आ रही है  छनकर?

कहीं तुम तो नहीं आ गए मेरे अंधेरों में  रोशनी बनकर?


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-015

10.8.21

M-010 न वक्त ठहरा है

न वक्त ठहरा है, न तुम ही ठहरे हो,

बस बेचारी ज़िन्दगी ही ठहर गई है।

खुशी रहा करती थी जिन चेहरों पर,

आज वहां संजीदगी ही ठहर गई है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-010


6.8.21

M-011 भूले हुओं को

भूले हुओं को बस यादों का सहारा है,
बिछुड़े हुओं को ख्वाबों का सहारा है,
समाप्त हो जाते हैं जब समस्त विकल्प,
जीवन जीने को दुआओं का सहारा है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-011

T-004 अब नहीं उम्मीद

अब नहीं उम्मीद कोई उससे मिलने की,
उम्मीद का दीया आखिर दीया ही तो है,
अब आगे उमीद नहीं उसके जलने की।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-003

5.8.21

M-013 दीपावली मुबारक

दीपावली हो मुबारक सभी को,
उन्हें भी जिन्हें हम जानते नहीं।
उन्हें भी जो दिल मे रहते तो हैं,
पर इस हक़ीक़त को मानते नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-013

M-012 कुछ पटाखे

कुछ पटाखे छोड़े जाते हैं,

और कुछ को छोड़ा नहीं जाता,

कुछ में आग लगाई जाती है,

कुछ में लगी लगाई आती है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-012


S- 037 मेरे दर्द-ओ-ग़म

मेरे दर्द-ओ-ग़म किसी शायरी से कम नहीं,


खुद मिलती है दाद उन्हें मोहताज हम नहीं।



-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-037









4.8.21

Q-020 तुम क्यों हो जाते हो

भला वो क्यों हो जाते हो रुसवा इनसे,

मेरे ये आसूं तो आदतन बह जाते हैं।

बेइंतहा फ़राख़-दिल हैं ये मेरे आंसू,

हरेक के लिए दफ़्फ़ातन बह जाते हैं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-020


S- 036 अक़ीदत जितनी

अक़ीदत जितनी मैं उसकी करता गया,
वो शख्स ख़ुद को ख़ुदा समझता गया।

-वीरेंसर सिन्हा "अजनबी" S-036

M-014 किताबो की बातों

किताबों की बातों से हटकर,

कहता मैं सच्ची बात ये खुलकर।

जीवन बड़ा कष्टमय है यदि वो,

जिया जाय भावनाओं में बहकर।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-014


 






3.8.21

M-003 सर पर जब

सर पर जब कोई मुसीबत आनी है,
इंसानियत दबे पांव खिसक जानी है,
धर्म मे विश्वास करो सेक्युलरों, वरना
तमाम होशियारी धरी रह जानी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  M-003

S- 035 दिए हैं आज

दिए हैं आज दर्द तो कोई ग़म ही नहीं,
जा ज़िन्दगी हमे तेरी ज़रूरत भी नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-035

S-034 तू जो ऐसा हो गया

तू जो ऐसा हो गया, इसमें तेरी कोई ख़ता नहीं,

ये ज़माने के सितम हैं, इनसे बच कोई सका नहीं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-034


1.8.21

Q- 021 ज़ुबाँ रखता हूँ

ज़ुबाँ रखता हूँ पर बेज़बान हो गया हूँ मैं,
ज़ेरे आगोश आके बदनाम हो गया हूँ मैं,
कोई मय-नोशी भी नहीं की "अजनबी"
फिर क्यों, किस्सा-ए-आम हो गया हूँ मैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-021

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...