1.8.21

Q- 021 ज़ुबाँ रखता हूँ

ज़ुबाँ रखता हूँ पर बेज़बान हो गया हूँ मैं,
ज़ेरे आगोश आके बदनाम हो गया हूँ मैं,
कोई मय-नोशी भी नहीं की "अजनबी"
फिर क्यों, किस्सा-ए-आम हो गया हूँ मैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-021

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