अक़ीदत जितनी मैं उसकी करता गया,
वो शख्स ख़ुद को ख़ुदा समझता गया।
-वीरेंसर सिन्हा "अजनबी" S-036
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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