4.8.21

Q-020 तुम क्यों हो जाते हो

भला वो क्यों हो जाते हो रुसवा इनसे,

मेरे ये आसूं तो आदतन बह जाते हैं।

बेइंतहा फ़राख़-दिल हैं ये मेरे आंसू,

हरेक के लिए दफ़्फ़ातन बह जाते हैं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-020


No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...