6.8.21

T-004 अब नहीं उम्मीद

अब नहीं उम्मीद कोई उससे मिलने की,
उम्मीद का दीया आखिर दीया ही तो है,
अब आगे उमीद नहीं उसके जलने की।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-003

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...