23.8.21

P-013 कुदरत से हम

कुदरत से हम छेड़-छाड़ कर सकते हैं, बदल नहीं सकते,

फ़ितरत इंसाँ की कम ज़्यादा कर सकते हैं, बदल नहीं सकते।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-013





No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...