31.7.21

S- 033 आपको भला

आपको भला क्यों इल्ज़ाम दें हम अपने क़त्ल का,
कसूरवार तो तलवार थी, हम थे और हमारी गर्दन थी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-033

30.7.21

P-016 मानसिक वेदनाओं

मानसिक वेदनाओं की जड़ हैं भावनाएं और संवेदनाएं,

जिसने इन्हें तिलांजलि दी, खत्म हुईं उसकी समस्याएं।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-016

22.7.21

Q-018 लौ चिराग़ की

लौ चिराग़ की योंही तेज़ न हुई है,

इशारा है चराग़ के बुझ जाने का।

मेरी हिचकियाँ भी बे-सबब नहीं,

इम्कान है एक और ज़ख्म पाने का।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-018


M-009 बड़े प्यार हैं

बड़े प्यारे हैं बच्चे,
सबके दुलारे हैं बच्चे,
प्रकृति के नज़ारे हैं बच्चे,
मनमोहक फुहारें हैं बच्चे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  M-009

Q-019 महज़ एक रंग

महज़ एक रंग नहीं चलता ज़माने में,
कभी कभी रंग बदलना भी सीख लीजिए।
तन्हाइयों उदासियों से बाहर आकर,
ज़िन्दगी को रंगीन करना भी सीख लीजिए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-019

20.7.21

T-003 मैं भी कहाँ

मैं भी कहाँ बेवफ़ाओं से उलझ गया हूँ,

दरियाऐ आतिश में कूदकर जोशे-जुनूँ में,

बच तो गया, पर आग में झुलस गया हूँ।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" T-003


S- 032 पहले दूरियां

पहले दूरियां बढ़ती हैं,या कि ग़लतफ़हमियाँ,
क्या फ़र्क़ पड़ता है,नतीजा तो बस तल्खियाँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-032

P-014 मासूमों कभी मासूम

मासूमों, कभी मासूम रह भी लिया करो।
दर्द तो दे देते हो,कभी सह भी लिया करो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-014

16.7.21

S- 031 हाथ छुड़ाने

हाथ छुड़ाने भर से ताल्लुक ख़त्म नहीं होता,
ख्वाबों-ख्यालों से भी निकलना पड़ता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-031

14.7.21

S- 030 अपने ग़मों को

अपने ग़मों को और न बढ़ा, खुद ग़मों का वाइस बनकर,
जो तू न था "अजनबी" वो ना बन, किसी की ख्वाहिश बनकर।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-030

13.7.21

M-008 यूं ही नहीं

यूँ ही नहीं आतीं हैं उबासियाँ,

बेसबब नहीं होतीं हैं उदासियाँ, 

दर्द की आवाज़ें आती रहती हैं,

भले छाई रहती हैं ख़ामोशियाँ।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-008


Q-017 ये "गुलज़ार" के

ये "गुलज़ार" के अंदाज़ में बातें न किया करो तुम,

सीधे-सादे कहा करो, उलझा न दिया करो तुम,

बारिश,छतरी,मौसम, मरासिम बहुत हो गए अब,

ज़रा कभी असल मुद्दे पर भी आ जाया करो तुम।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-017


S- 029 ये तीरगी

तीरगी आमादा है ज़िन्दगी पर क़ाबिज़ होने को,
आख़री शुआ-ए-उम्मीद को भी आग़ोश में ले लिया उसने।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-021

12.7.21

S- 028 यादें खामोश

यादें ख़ामोश होती हैं कोई इज़हार नहीं करतीं हैं,
कुछ तो ख़ामोशी से मार डालती हैं, वार नहीं करतीं हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-025

Q- 016 तू भले छोड़ दे

तू भले ही छोड़ दे हमको, हम नहीं छोड़ेंगे,
तू चाहे मुंह मोड़ ले हमसे, हम नहीं मोड़ेंगे,
अब तो जिए जा रहे हैं हम बस इसलिए,
हम तेरा भरोसा पाए बिन,दम नहीं तोड़ेंगे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-016

11.7.21

Q-015 यौमे-पैदाइश

यौमे-पैदाइश आ रहे हैं, जा रहे हैं,
और सिमटती जारहीं हैं जिंदगियां,
साल दर साल बढ़ रहे हैं रंजो-ग़म,
और बढ़ती ही जा रहीं है दूरियां।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-015

8.7.21

P-012 भूख वो चीज़ है

भूख वो चीज़ है जो गरीबों की तो मिट जाती है,

मगर अमीरों की मिटती नहीं, और बढ़ जाती है।


- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-012


7.7.21

P-011 हराकर कुर्सी

हराकर कुर्सी-नशींनों को, हम कुर्सी पर बैठे हैं।
बचाकर देश को, हम जनादेश से कुर्सी पर बैठे हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-011




P-010 वो तो खुदा ने

वो तो खुदा ने इंसाँन को चंद ताकतों से वंचित रखा हुआ है,  

वरना वो तो दुनियां में नफरतों का साम्राज्य स्थापित कर देता।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-010


S-026 हमे तो ज़िन्दगी

हमे तो ज़िन्दगी से वपस मांगने जैसा भी कुछ नहीं,
ज़िन्दगी अगर गुज़िश्ता वक्त से कुछ मांगने को कहे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-026

3.7.21

S-025 आपकी निगाहों में

आपकी निगाहों में अगर हम थे गुस्ताख़, हम ही गुनाहगार थे,
तो ये भी सच है, सिर्फ़ हम ही थे मुश्ताक़,
हम ही ग़मगुसार थे।

 -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-025

S-027 काहे का गिला

काहे का गिला शिकवा काहे की नाराज़गी,
जब मतलबी इश्क़ में जायज़ होगया सभी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-027

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...