अपने ग़मों को और न बढ़ा, खुद ग़मों का वाइस बनकर,
जो तू न था "अजनबी" वो ना बन, किसी की ख्वाहिश बनकर।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-030
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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