ये "गुलज़ार" के अंदाज़ में बातें न किया करो तुम,
सीधे-सादे कहा करो, उलझा न दिया करो तुम,
बारिश,छतरी,मौसम, मरासिम बहुत हो गए अब,
ज़रा कभी असल मुद्दे पर भी आ जाया करो तुम।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-017
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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