12.7.21

S- 028 यादें खामोश

यादें ख़ामोश होती हैं कोई इज़हार नहीं करतीं हैं,
कुछ तो ख़ामोशी से मार डालती हैं, वार नहीं करतीं हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-025

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...