28.10.23

M-077 आजकल किसी गूंगे

आजकल किसी गूंगे से ही दोस्ती बेहतर है,
ये डर तो नहीं वो कब बात करना छोड़ देगा,
डर के रहो "अजनबी" तुम ख़ुदा की मार से
कौन जाने वो कब रुख हवाओं का मोड़ देगा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-077

P-225 मैं क्यों अपना दिल

मैं क्यों अपना दिल टूटने दूं, रिश्ता ही ना तोड़ दूं।

मैं दुनियां क्यों छोडूं, उम्मीद करना ही ना छोड़ दूं।



-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-225

S-287 वो जिनके लिए हम

वो जिनके लिए हम ज़माने से बेगाने हो गए,
उन्हीं के लिए आज हम गुज़रे ज़माने हो गए।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-287

27.10.23

K-012 जिसकी सोच ही

जिसकी सोच ही संकुचित है,
वह भावनाओं से भी रहित है।

पृथ्वी हो कितनी भी विशाल,

वह तो स्वयं  मे ही सीमित है।


कितनी भी सु-स्पष्ट हो स्थिति,

ऐसा व्यक्ति फिर भी भ्रमित है।


संदेह कौन मिटा पाया उसका,

जो शंकाओं से ही श्रापित है।


सोच में कोई लोच नहीं उसकी,

परिवर्तित न होना ही प्रकृति है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-012

26.10.23

Q-138 खंडहर हो गई

खंडहर हो गई मेरी रौनक आमेज़ हवेली, पर
आज भी इसमें  मेरी बर्बादी के जश्न मनते हैं।
दूर तक इर्द गिर्द छाई होती है जब तारीकी,
मेरी यादों के चराग़ ख़ुद ब ख़ुद इसमे जलते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-138

25.10.23

Q-137 किसी के ना होने

किसी के नहीं होने से भला कौन अकेला होता है।

शहरे-ख़ामोशां में तो हर शख़्स अकेला होता है।

"अजनबी" बना या न बना हमसफ़र तू किसी को ,

सफ़र-ए-आख़िरी में तो हर कोई अकेला होता है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-137










24.10.23

Q-136 इंसाँ पर खुदको

इंसाँ पर ख़ुदको पाकसाफ़ बताने के हज़ार तरीके,

सारे जहांन को गुनाहगार ठहराने के बेशुमार तरीके,

कोई कुछ भी मुग़ालता पाल ले कितना भी खुश होले,

ख़ुदा के पास है  सज़ा देने के बड़े सदाबहार तरीके।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-136

S-286 हल्के में ले लिया

हल्के में ले लिया हमे किसी ने,
वजूद में भारी लग रहे थे हम उसे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-286

23.10.23

M-076 जिसकी सोच ही

जिसकी सोच ही संकुचित है,
वह भावनाओं से भी रहित है,
पृथ्वी कितनी भी हो विशाल,
वह तो स्वयं में ही सीमित है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-076

S-285 ऐसा लगता है

ऐसा लगता है, आज भी तुम्हारा साथ है,

वरना इस वीराने में मुझसे चला कहाँ जाता।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-285

22.10.23

G -017 ना तो सोचा, ना समझा

ना तो सोचा, ना समझा उसने।
हल्का सा एक वादा कर दिया उसने।

बात तो थोड़ी गहरी थी मेरी, 🆚

मगर कुछ हल्के में ले लिया उसने।


अलग समझा था मैंने उसे, मगर,

जो सबने किया, वही किया उसने।


जिन सफ़ों में बयाँ थे दर्द मेरे, 🆚

उन्हें ही पढ़ने से छोड़ दिया उसने।


आगे सफ़र अभी लंबा था काफ़ी,

मगर काट के छोटा कर दिया उसने।


नाज़ था तुझे "अजनबी" उस पर,

किसी ने शर्मिंदा किया, तो किया उसने।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-017



P-224 हम नाज़ुक दिलों को

हम नाज़ुक दिलों को कहां आता है पत्थर दिलों से टकराना,
हम ख़ुद ही टूट कर बिखर जाते हैं, ज़रा सी एक ठसक से। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-224

11.10.23

S-284 मुहब्बत भी कर ले

मुहब्बत भी कर ले,  कंफ्यूज़न निकाल के,
जैसे ज़ुल्फ़ बिखरा लीं तूने ख़म निकाल के,

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-284

9.10.23

Q-135 कोई हो गया बेवफ़ा

कोई हो गया बेवफ़ा तो होजाए, मैं ग़मज़दा नहीं हूँ।
मेरे इर्दगिर्द पड़े हैं जाम इतने,पर मैं तिशनगा नहीं हूँ।
चाय-कॉफी की चुस्कियाँ ही बढ़ा देती हैं लौ मेरी,
मैं तो जलता हुआ चराग़ हूँ, मैं कभी बुझा नहीं हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-135

7.10.23

G-016 टूट गया हूँ

टूट गया हूँ पर बिखरा नहीं हूँ,
तन्हाई में हूँ, पर तन्हा नहीं हूँ।

अब कम जानते हैं लोग मुझे,
पहले सा अब आशना नहीं हूँ।

निकला हूँ किताब के पन्नों से,
फूल तो हूँ पर महका नहीं हूँ।

मेरी ख़ामोशी पे न जाए कोई,
मैं इंसाँ हूँ, मुजस्सिमा नहीं हूँ।

मेरा वजूद टिका है मेरे पांवों पर,
मैं ज़मीन पर हूँ,  उड़ता नहीं हूँ।

दर्द-ओ-ग़म सभी के हूँ साथ,
बा-वफ़ा हूँ मैं,  बदला नहीं हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-016

M-075 टूट गया हूँ पर,

टूट गया हूँ पर बिखरा नहीं हूँ,
तन्हाई में हूँ, पर तन्हा नहीं हूँ,
दर्द-ओ-ग़म सभी हैं मेरे साथ,
बा-वफ़ा हूँ मैं,  बदला नहीं हूँ।

-वीरेंद्र सिन्हा ,"अजनबी" M-075



K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...