ये डर तो नहीं वो कब बात करना छोड़ देगा,
डर के रहो "अजनबी" तुम ख़ुदा की मार से
कौन जाने वो कब रुख हवाओं का मोड़ देगा।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-077
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
मैं क्यों अपना दिल टूटने दूं, रिश्ता ही ना तोड़ दूं।
मैं दुनियां क्यों छोडूं, उम्मीद करना ही ना छोड़ दूं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-225
पृथ्वी हो कितनी भी विशाल,
वह तो स्वयं मे ही सीमित है।
कितनी भी सु-स्पष्ट हो स्थिति,
ऐसा व्यक्ति फिर भी भ्रमित है।
संदेह कौन मिटा पाया उसका,
जो शंकाओं से ही श्रापित है।
सोच में कोई लोच नहीं उसकी,
परिवर्तित न होना ही प्रकृति है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-012
किसी के नहीं होने से भला कौन अकेला होता है।
शहरे-ख़ामोशां में तो हर शख़्स अकेला होता है।
"अजनबी" बना या न बना हमसफ़र तू किसी को ,
सफ़र-ए-आख़िरी में तो हर कोई अकेला होता है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-137
सारे जहांन को गुनाहगार ठहराने के बेशुमार तरीके,
कोई कुछ भी मुग़ालता पाल ले कितना भी खुश होले,
ख़ुदा के पास है सज़ा देने के बड़े सदाबहार तरीके।
ऐसा लगता है, आज भी तुम्हारा साथ है,
वरना इस वीराने में मुझसे चला कहाँ जाता।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-285
बात तो थोड़ी गहरी थी मेरी, 🆚
मगर कुछ हल्के में ले लिया उसने।
अलग समझा था मैंने उसे, मगर,
जो सबने किया, वही किया उसने।
जिन सफ़ों में बयाँ थे दर्द मेरे, 🆚
उन्हें ही पढ़ने से छोड़ दिया उसने।
आगे सफ़र अभी लंबा था काफ़ी,
मगर काट के छोटा कर दिया उसने।
नाज़ था तुझे "अजनबी" उस पर,
किसी ने शर्मिंदा किया, तो किया उसने।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-017
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...