23.10.23

M-076 जिसकी सोच ही

जिसकी सोच ही संकुचित है,
वह भावनाओं से भी रहित है,
पृथ्वी कितनी भी हो विशाल,
वह तो स्वयं में ही सीमित है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-076

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