टूट गया हूँ पर बिखरा नहीं हूँ,
तन्हाई में हूँ, पर तन्हा नहीं हूँ।
तन्हाई में हूँ, पर तन्हा नहीं हूँ।
अब कम जानते हैं लोग मुझे,
पहले सा अब आशना नहीं हूँ।
निकला हूँ किताब के पन्नों से,
फूल तो हूँ पर महका नहीं हूँ।
मेरी ख़ामोशी पे न जाए कोई,
मैं इंसाँ हूँ, मुजस्सिमा नहीं हूँ।
मेरा वजूद टिका है मेरे पांवों पर,
मैं ज़मीन पर हूँ, उड़ता नहीं हूँ।
दर्द-ओ-ग़म सभी के हूँ साथ,
बा-वफ़ा हूँ मैं, बदला नहीं हूँ।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-016
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