खंडहर हो गई मेरी रौनक आमेज़ हवेली, पर
आज भी इसमें मेरी बर्बादी के जश्न मनते हैं।
दूर तक इर्द गिर्द छाई होती है जब तारीकी,
मेरी यादों के चराग़ ख़ुद ब ख़ुद इसमे जलते हैं।
आज भी इसमें मेरी बर्बादी के जश्न मनते हैं।
दूर तक इर्द गिर्द छाई होती है जब तारीकी,
मेरी यादों के चराग़ ख़ुद ब ख़ुद इसमे जलते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-138
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