27.10.23

K-012 जिसकी सोच ही

जिसकी सोच ही संकुचित है,
वह भावनाओं से भी रहित है।

पृथ्वी हो कितनी भी विशाल,

वह तो स्वयं  मे ही सीमित है।


कितनी भी सु-स्पष्ट हो स्थिति,

ऐसा व्यक्ति फिर भी भ्रमित है।


संदेह कौन मिटा पाया उसका,

जो शंकाओं से ही श्रापित है।


सोच में कोई लोच नहीं उसकी,

परिवर्तित न होना ही प्रकृति है।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-012

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