जिसकी सोच ही संकुचित है,
वह भावनाओं से भी रहित है।
वह भावनाओं से भी रहित है।
पृथ्वी हो कितनी भी विशाल,
वह तो स्वयं मे ही सीमित है।
कितनी भी सु-स्पष्ट हो स्थिति,
ऐसा व्यक्ति फिर भी भ्रमित है।
संदेह कौन मिटा पाया उसका,
जो शंकाओं से ही श्रापित है।
सोच में कोई लोच नहीं उसकी,
परिवर्तित न होना ही प्रकृति है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-012
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