22.10.23

G -017 ना तो सोचा, ना समझा

ना तो सोचा, ना समझा उसने।
हल्का सा एक वादा कर दिया उसने।

बात तो थोड़ी गहरी थी मेरी, 🆚

मगर कुछ हल्के में ले लिया उसने।


अलग समझा था मैंने उसे, मगर,

जो सबने किया, वही किया उसने।


जिन सफ़ों में बयाँ थे दर्द मेरे, 🆚

उन्हें ही पढ़ने से छोड़ दिया उसने।


आगे सफ़र अभी लंबा था काफ़ी,

मगर काट के छोटा कर दिया उसने।


नाज़ था तुझे "अजनबी" उस पर,

किसी ने शर्मिंदा किया, तो किया उसने।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-017



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