उसे भी होता है कुछ-कुछ, पर उसने अभी तक नहीं माना,
"अजनबी" इसे कहते हैं "आधी हक़ीक़त आधा फसाना"
"अजनबी" इसे कहते हैं "आधी हक़ीक़त आधा फसाना"
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-219
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
जितना छुपाता हूँ उतने ही नज़र आते हैं,
ये जज़्बात दबते नहीं, फिर उभर आते हैं।
सिर्फ़ वक्त ही नहीं बदलता, बातों के मायने भी बदल जाते हैं,
चीज़ें ही नहीं बदल जातीं, उन्हें नापने के पैमाने भी बदल जाते हैं,
मत ढूँढता फिर तू "अजनबी" लोगों को पुराने पतों पर अब,
हवेलियां ढह जाती हैं, रहने वालों के ठिकाने भी बदल जाते हैं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-128
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...