28.8.23

P-219 उसे भी होता है कुछ कुछ

उसे भी होता है कुछ-कुछ, पर उसने अभी तक नहीं माना,
"अजनबी" इसे कहते हैं "आधी हक़ीक़त आधा फसाना" 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-219

G-014 ज़रूरी नहीं

ज़रूरी नहीं चौखटें ही हों,
बिन चोखट के भी मर्यादा रखी जा सकती है।
ज़रूरी नहीं दरवाज़े ही हों,
बिन दरवाज़ों के भी दस्तक दी जा सकती है।
ज़रूरी नहीं आया ही हो कोई,
आने की आहट फिर भी सुनी जा सकती है।
ज़रूरी नहीं बैर ही हो किसी से,
करीब आने को भी लड़ाई की जा सकती है।

- वीरेंद्र सिन्हा " अजनबी" G-014

25.8.23

P-218 बारिश जो लगती थी

बारिश जो लगती थी दिलकश सुहानी,
आज लग रही बस ऊपर से गिरता पानी।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-218

M-073 मौसम भी है नीरस

मौसम भी है नीरस  ऊट पटांग सा,
कुछ-कुछ बिन बुलाए मेहमान सा"
तुम बिन सभी है अव्यवस्थित प्रिये,
घर लग रहा मुझे खंडहर मकान सा।

 -वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-073

M-072 लिखने बैठा

लिखने बैठा तो कुछ सूझा ही नहीं,
शायद आज मुझ में ऊर्जा ही नहीं।
सोचा था  आज बता देंगे हाल उसे,
किंतु निर्दयी ने आज पूछा ही नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-072

Q-131 रुक गई ज़िन्दगी

रुक गई ज़िन्दगी तेरे बग़ैर,
अब इसमें हरकत ही नहीं।
सभी लगने लगे हैं अब ग़ैर,
अब किसी से कुर्बत ही नहीं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-131

Q-130 तुम नहीं आते,

तुम नहीं आते, तो ये आहटें क्यों होती हैं,
नम आंखों में भी मुस्कुराहटें क्यों होती हैं,
यूं तो मुसलसल धड़कता रहता है ये दिल,
फिरभी कभी कभी रुकावटें क्यों होती हैं।
 
- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-130

S-280 जितना छुपाता हूँ

जितना छुपाता हूँ उतने ही नज़र आते हैं,

ये जज़्बात दबते नहीं, फिर उभर आते हैं।

- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-280

24.8.23

Q-129 अच्छा है सीने में

अच्छा है सीने में छिपा रहता है दिल,
वर्ना जलता देेेख, लोग हाथ सेक लिया करते।
रुसवाईयाँ भी बहुत हो जाया करतीं,
दिल को अगर लोग रोता देख लिया करते। 

वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-129

23.8.23

S-279 रुक तो नहीं

रुक तो नहीं गई ज़िन्दगी तेरे बग़ैर,
पर हाँ तेरे जाने से सभी बन गए अब ग़ैर।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-279

21.8.23

Q-128 सिर्फ वक़्त ही

सिर्फ़ वक्त ही नहीं बदलता, बातों के मायने भी बदल जाते हैं,

चीज़ें ही नहीं बदल जातीं, उन्हें नापने के पैमाने भी बदल जाते हैं,

मत ढूँढता फिर  तू "अजनबी" लोगों को पुराने पतों पर अब,

हवेलियां ढह जाती हैं, रहने वालों के ठिकाने भी बदल जाते हैं। 

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  Q-128


19.8.23

S-278 तुझे भी मैन देंख

तुझे भी मैंने देख लिया, ऐ चहकती हुई सुबह!
तू भी मेरी शाम से भी ज़्यादा ग़मगीन होती है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-278

18.8.23

S-277 कैसे कह दूं

कैसे कह दूं उस शख़्स को हमसफ़र अपना, 
जो राह में ज़रा सा मेरे करीब से गुज़र गया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-277
                  

16.8.23

S-276 चार दिन में ही

चार दिन में ही वापस आ धमके मेरे तमाम ग़म, 
बड़ा शौक सा चरमराया था मुझे ख़ुश रहने का।

-वीरेन्द्र सिन्हा "अजनबी" S-276
 

14.8.23

K-010 आज़ादी के लिए

 
आज़ादी के लिए शहीद सूली चढ़ गए,
भ्रष्टों ! तुम अपने स्वार्थों की बलि ही दे दो।

विदेशी लूटेरों से धरती उन्होंने बचा दी,
तुम देसी लुटेरों से देश को मुक्ति ही दे दो।

विदेशी तानाशाहों ने ले ली बलि सबकी,
तुम ससम्मान जीने की पद्दति ही दे दो।

हमारे सुंदर सपनों की नींव उन्होंने रख दी,
तुम उनके साकार होने की युक्ति ही देदो।

फिरंगियों से आज़ादी हमे उन्होंने दिला दी,
तुम ज़िंदगी की जद्दोजहद से छुट्टी ही दे दो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-010

K-009 भगत सिंह की

भगतसिंह की संतानें हैं, कसम नहीं खाते करके दिखा देते हैं हम।
एक आवाज़ पे, दुश्मन को उसी की ज़मीं में दफ़ना देते हैं हम।

दयालु हैं, मानवता के पुजारी हैं, पशुओं को भी प्यार किया हमने,
वहशी दरिंदे गर उठाऐं सर तो, सुदर्शन चक्र भी चला देते हैं हम।

वसुधेव-कुटम्बकम के हम प्रणेता, शांति मार्ग दिखाया है हमने,
आक्रमण, नरसंहार करने वालों को सबक भी सिखा देते हैं हम।

सर्वधर्म सद्भाव हम में है, सबको फलने-फूलने का मौका दिया हमने,
शत्रु अगर पहुंचाए हानि तो विश्व-नक़्शे से उसे मिटा देते हैं हम।

दैनिक झड़प,ओच्छेपन, कायरता में रखा नहीं यकीन हमने,
इतिहास गवाह है,एक बार में नेस्तनाबूद करके बता देते हैं हम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" K-009

3.8.23

M-071 बस होने ही वाला था

बस होने ही वाला था प्यार कि,
उसने अपना मास्क उतार दिया।
प्रथम दृष्टि में चढ़ा था जो बुखार,
एक सेकंड में उसने उतार दिया।
एक सेकंड में उसने उतार दिया।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" M-071

1.8.23

S-275 ज़िद बड़ी शय है

ज़िद बड़ी शय है जिंदगी से भी बढ़के,
लोग ज़िन्दगी छोड़ सकते हैं ज़िद नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-275

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...