रुक गई ज़िन्दगी तेरे बग़ैर,
अब इसमें हरकत ही नहीं।
सभी लगने लगे हैं अब ग़ैर,
अब किसी से कुर्बत ही नहीं।
अब इसमें हरकत ही नहीं।
सभी लगने लगे हैं अब ग़ैर,
अब किसी से कुर्बत ही नहीं।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-131
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
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