25.8.23

S-280 जितना छुपाता हूँ

जितना छुपाता हूँ उतने ही नज़र आते हैं,

ये जज़्बात दबते नहीं, फिर उभर आते हैं।

- वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-280

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K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...