कुछ लोग तकलीफ़ में हैं कि दुनिया उनके पीछे पड़ी है,
वे नहीं जानते कि तुम हो क्या जो वो तुम्हारे पीछे पड़ी है।
वे नहीं जानते कि तुम हो क्या जो वो तुम्हारे पीछे पड़ी है।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-079
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
खोजना भी नहीं पड़ता शिकार को,
वो खुद चला आता है सर झुका कर।
अपनी ज़ुबाँ को ज़हमत कौन दे,
इज़हार करते हैं नज़र झुका कर।
ख़ामोशी ग़ज़ब की, जवाब देते हैं,
पल्लू का कोना दांतों में दबा कर।
सामने आते नहीं, छुप भी जाते नहीं,
सलाम करते हैं दरवाज़े के पीछे जा कर।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-007
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...