29.4.22

P-079 कुछ लोग

कुछ लोग तकलीफ़ में हैं कि दुनिया उनके पीछे पड़ी है,
वे नहीं जानते कि तुम हो क्या जो वो तुम्हारे पीछे पड़ी है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  P-079

Q-058 खुशियां लगने लगतीं

खुशियां लगने लगती हैं और भी अच्छी मुझको,
गुज़िश्ता ग़मों को जब याद मैं कर लेता हूँ,।
अपने तमाम दर्द लगने लगते हैं  कम मुझको,
जज़्बात से अपने जब इत्तिलाफ़ मैं कर लेता हूँ।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-058

26.4.22

S-114 काश हमने कर ली

काश हमने कर ली होती कोई ख़ता,
जायज़ तो कहलाती उनकी दी हुई सज़ा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-114

24.4.22

Q-057 चाहे कितनी भी

चाहे कितनी भी हो देर-अंधेर,
हिसाब किताब सबका होगा।
कोई कितनी भी करले हेर-फेर,
एकदिन इंसाफ़ सबका होगा।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-057

23.4.22

S-113 अब किसी से

अब किसी से हम क्यों मुहब्बत मांगें,
जब अपने ही हमारा त-आर्रुफ़ मांगें।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-113

G-007 मिलती है तसकीन

मिलती है तस्कीन दिल जला कर,
हुस्न की अदा है लड़ना इतरा कर।
 
कोई आला-ऐ-क़त्ल भी नहीं रखते,
जान ले लेते हैं महज़ मुस्कुरा कर।

खोजना भी नहीं पड़ता शिकार को,

वो खुद चला आता है सर झुका कर।


अपनी ज़ुबाँ को ज़हमत कौन दे,

इज़हार करते हैं नज़र झुका कर।


ख़ामोशी ग़ज़ब की, जवाब देते हैं,

पल्लू का कोना दांतों में दबा कर।


सामने आते नहीं, छुप भी जाते नहीं,

सलाम करते हैं दरवाज़े के पीछे जा कर।


-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" G-007

Q-056 इतना न ऊंचा

इतना न ऊंचा समझ खुद को,
कि तमाम कायनात बौनी लगे।
इतना भी न खींच दे तू बात को,
कि मुख्तसर बात कहानी लगे।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-056

S-112 मैं नहीं मांगता

मैं नहीं मांगता दाद किसी से,
वो दाद ही क्या जो मांगे से मिले।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-112

22.4.22

P-078 ग़म क्या हैं

ग़म क्या हैं, वो आते हैं चले जाते हैं,
ग़म देने वाले मगर याद रह जाते हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-078

17.4.22

S-111 कभी यादों में

कभी यादों में कभी ख़्वाबों में कभी ख़्यालों में आते हो,
क्यों ज़िन्दगी को सिर्फ़ आने और चले जाने में बिताते हो ।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-111


Q-054 मयखाने भी अब

मयखाने भी अब मैं जाता नहीं,
फिर भी हर शाम ये कैसा ख़ुमार है।
धोखे खाकर भी ख़त्म होता नहीं,
न जाने "अजनबी" ये कैसा प्यार है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" Q-054

16.4.22

P-077 आज इंसान सब कुछ

आज इंसान सब कुछ अपने मुताबिक चाहता है,
अपने लिए खुशी, तो दूसरे के लिए ग़म चाहता है।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" P-077

14.4.22

S-110 बेवफाई का गुर

बेवफ़ाई का गुर न पूछो उनसे, "अजनबी",
हुनरमंद अपना हुनर यूँही नहीं बता देते।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-110

13.4.22

S-109 ये तेरी बेवफाई

ये तेरी बेवफ़ाई थी जिसने मुझसे इतनी ग़ज़लें लिखवाईं हैं,
मैं तेरा मशक़ूर हूँ, जो तूने मुझे इतनी शोहरतें दिलवाईं हैं।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-109

12.4.22

Q-053 चाहत को खुद

चाहत को ख़ुद ही समझ लो,
मुझसे न कहलवाओ तुम।
दिल की आवाज़ को सुन लो,
मुझसे न मुश्तहरी करवाओ तुम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी Q-053

S-108 मुझे क्यों हो

मुझे क्यों हो दर्द तेरे दूर जाने का,
जब तू रहती है मेरे ख़्वाबों ख्यालों में।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-108

11.4.22

S-107 क्या जाता जो

क्या जाता जो वीराँ ज़िन्दगी में कुछ देर को आ जाती,
वक्त-ए-आखिरी में कुछ लम्हों को रौनक तो आ जाती।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी" S-107

9.4.22

S-106 तुम जो ये

तुम जो ये ख़ामोशी अख्तियारे बैठे हो,
ख़ुद ही सामाने-पशेमानी किये बैठे हो।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी"  S-106

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...