चाहत को ख़ुद ही समझ लो,
मुझसे न कहलवाओ तुम।
दिल की आवाज़ को सुन लो,
मुझसे न मुश्तहरी करवाओ तुम।
मुझसे न कहलवाओ तुम।
दिल की आवाज़ को सुन लो,
मुझसे न मुश्तहरी करवाओ तुम।
-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी Q-053
ग़ज़ल, किता, अशार, कविता, मुक्तक, पंक्तियां, हायकू आदि वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी की रचनाएं
सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...
No comments:
Post a Comment