12.4.22

Q-053 चाहत को खुद

चाहत को ख़ुद ही समझ लो,
मुझसे न कहलवाओ तुम।
दिल की आवाज़ को सुन लो,
मुझसे न मुश्तहरी करवाओ तुम।

-वीरेंद्र सिन्हा "अजनबी Q-053

No comments:

Post a Comment

K-007 सूरज को मैं

सूरज को मैं समेट लूं, अपने ही आँगन में, चाँद की रौशनी भर लूं अपने ही दामन में। पर्वतों को ध्वस्त कर दूं, जंगल काट डालूँ, मौसम बदल कर 'सू...